• 07 Mar, 2026

टनल के मूल प्लान में बाहर आने के तीन रास्ते थे, कंपनी ने एक भी नहीं बनाया, निरीक्षण में अनदेखी....

टनल के मूल प्लान में बाहर आने के तीन रास्ते थे, कंपनी ने एक भी नहीं बनाया, निरीक्षण में अनदेखी....

• सिलक्यारा टनल के निर्माण में कई अनियमितताएं, अहम शर्तें ही गायब मिलीं--

 उत्तरकाशी/ नई दिल्ली।   मजदूरों के टनल में फंस जाने के बाद उनके बचाव कार्य के बाद लाइम लाइट में आये सिल्क्यारा -डंडारगांव टनल का काम सेफ्टी ऑडिट के बाद भी जारी रहेगा। क्योंकि यह टनल 12 हजार करोड़ रुपये के महत्वाकांक्षी चार धान ऑल वेदर रोड प्रोजेक्ट का अहम हिस्सा है।  हालांकि इसकी निर्माण खामियों पर उठ रहे सवालों पर निर्माण एजेंसी और केन्द्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय अभी खामोश है। 

    निरंतर पहल संवाददाता के अनुसार टनल परियोजना के विस्तृत परियोजना रिपोर्ट ( डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट ) और अभी तक इस योजना में हुए निर्माण में साम्य नहीं है बल्कि बड़ा अंतर देखा गया है। इतना होने पर निरीक्षण के स्तर पर भी इस चूक की अनदेखी की गई। परियोजना  की  आरएफपी यानी रिक्वेस्ट फार प्रपोजल देखने पर नेशनल हाईवे एंड इन्फ्रास्ट्रक्चरल डिवेलपमेंट कॉ. लिमिटेड द्वारा बनाए टनल के मूल निर्माण का प्लान समझा जा सकता है। 

    मूल प्लान में आपात स्थिति आने पर टनल से  सुरक्षित बाहर निकलने के लिए तीन रास्ते कागज पर हैं जिनमें से एक का भी निर्माण  इसे बनाने वाली कंपनी ने नहीं किया इसे चूक मान भी लें तो इससे भी बड़ी चूक इस प्लान के अनुसार काम हुआ भी है या नहीं इसका परीक्षण करने वाली एजेंसी ने भी इसकी अनदेखी की। 

सुरंग की खुदाई में भी गलती हुई है...

  • मंत्रालय की गणना करने वाली एस्टिमेट कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक 1383.78 करोड़ रुपये की परियोजना में दो लेन की बाय डायरेक्शनल टनल, इसके ऑपरेशन और मेंटेनेंस के अलावा संपर्क मार्ग और एस्केप पैसेज ( सुरक्षित बाहर निकलने के रास्ते ) का निर्माण शामिल था। 
  • एनएचआईडीसीएल ने शार्टलिस्टेड दस कंस्ट्रक्शन कंपनियों में से एक एनईसीएल यानी नवयुग इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड को 853.79 करोड़ रुपये में ठेका दिया।  फिर एनईसीएल ने तीन अन्य कंपनियों  क्रमशः श्री सांई कंस्ट्रक्शन, नव दुर्गा और पीबी चड्ढा के जरिये मजदूरों को अनुबंधित किया
  • तय यह हुआ कि टनल , एस्केप पैसेज और अप्रोच रोड 8 जुलाई 2022 तक बना लिए जाएंगे।  इसका  काम जुलाई 2018 में शुरू हुआ था लेकिन अभी तक केवल 56 फीसदी ही काम इस पर हो पाया है। अब इसकी डेडलाइन बढ़ाकर मई 2024 कर दी गई है। रेस्क्यू पैसेज तो टनल में है ही नहीं। 
  • निप संवाददाता ने जब कंपनी से सवाल किया तो बताया गया कि टनल में इसकी आवश्यकता ही नहीं थी क्योंकि  दोनो लेन के बीच दीवार में आपात काल में बाहर निकलने वाले गेट का प्रावधान है। इससे आपात स्थिति में एक से दूसरी तरफ मूवमेंट किया जा सकता है। जबकि सचाई यह है कि टनल में अभी तक कहीं भी एक्जिट गेट कहीं भी नहीं है। 
  • सुरंग के खोदे गए हिस्से में सुरक्षा पाइप (ह्यूम) नहीं डाले गए हैं। इस प्रोजेक्ट के लिए एनएचआईडीसीएल के महाप्रबंधक के रूप में काम कर रहे दीपक पाटिल ने बताया कि कमजोर स्थानों पर ही ह्यूम पाइप का उपयोग करने की योजना थी लेकिन इस तरह होगा इसका किसी को भी एहसास तक नहीं था। 

चूने की चट्टान पर बनी है सिल्कायारा टनल

ढहने का खतरा ज्यादा है... 
नवीन जुयाल, भूविज्ञानी . 
रवि चोपड़ा, भूवैज्ञानिक ...

  • इस प्रोजेक्ट का निर्माण और भू- वैज्ञानिक तकनीक सर्वेक्षण ठीक तरह से नहीं हुआ है। सुरंग का स्थान मेन सेंट्रल थ्रस्ट के करीब है और यह क्षेत्र भूकंप संभावित क्षेत्र है। सर्वेक्षण में इस अहम तथ्य की अनदेखी की गई है। इस कंपनी की डीपीआर और निर्माण कंपनी के काम की गहन जांच होनी चाहिए। सिल्क्यारा सुरंग चूने की चट्टान ( चलछटी चट्टान) वाले क्षेत्र में बनाई जा रही है जिससे इसके बार बार ढहने का खतरा बना रहेगा। इसके दो संभावित कारण हैं
  • पहला ब्लाइंड शियर जोन की संभावना, जिसकी पहले रिपोर्ट नहीं की गई थी।  दूसरा -सुरंग बनाने के लिए विस्फोटकों का उपयोग । यह घटना सुरंग निर्माण सुरक्षा प्रोटोकॉल से समझौते का नतीजा है। 

जांच कमेटी भी सवालों में

दुर्घटना की जांच समिति का नेतृत्व निदेशक, भूस्खल शमन और प्रबंधन केन्द्र (एलएमएमसी) उत्तराखंड कर रहे हैं। एलएमएमसी एक नया स्वायत्त निकाय है। इसमें कोई भू-वैज्ञानिक ही नहीं है, सिर्फ इंजीनियर्स हैं। 6 सदस्यों वाली समिति में श्रमिक संघ या कोई स्वतंत्र विशेषज्ञ भी नहीं है।