उनकी मांग के पक्ष में खाप पंचायतें भी खुलकर सामने आ गई हैं, सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान में बात आने पर सख्ती से आरोपी बाहुबली सांसद बृजभूषण शरण के खिलाफ बड़ी मुश्किल से एफआईआर तो दर्ज की गई पर आरोप पत्र तैयार नही किया जा रहा। केंद्र की चुप्पी को भले ही लोग आपराधिक समझें - देखें पर सरकार की अपनी अलग प्राथमिकताएं हैं उसमें भी सबसे ऊपर है चुनाव... तो बीते महीने कर्नाटक के चुनाव में केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी की हार ने उनके मनोबल को तोड़ा ही है । जिस पार्टी को धर्म के ध्रुवीकरण के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर इतना भरोसा हो गया था कि उसे लगने लगा था कि हर मर्ज की दवा बस एक चेहरा मोदी ही है। पर उत्तर भारत में सियासी लड़ाई के लिए आजमाए हुए उनके नुस्खे दक्षिण में जा कर दो कौड़ी के नहीं रह गये हैं। कर्नाटक की जनता ने उन्हें हिंदू- मुस्लिम खांचे में डालने की जबरिया कोशिश को सिरे से नकार कर बता दिया कि मोदी नाम के चेहरे का तिलस्म खत्म होता जा रहा है। दक्षिण की राजनीति की अपनी अलग तासीर है, वहां भी केंद्र से बैठकर लोकतांत्रिकता की अनदेखी कर कर्नाटक को अपनी तरह से देखना -समझना भाजपा को भारी पड़ गया।
इधर करारी हार से बुझे चेहरे की मलिनता धोने का अवसर भी निकाल लिया गया। जब देश को नया संसद भवन सौपने की तैयारी करते हुए आनन- फानन में केवल श्रेय लेने की लिप्सा ने आंखों की बीनाई भी सही नहीं रहने दी , इतनी कि ये भी भान न रहा कि इस भवन का उद्घाटन राष्ट्रपति के हाथों सम्भवत: कही ज्यादा सुरुचिपूर्ण और गरिमामय मालूम पड़ता। संसद का उच्च सदन तो चलता ही उपराष्ट्रपति के सभापतित्व में है। एक आदिवासी और महिला राष्ट्रपति के हाथों उद्घाटन कितना गरिमापूर्ण मालूम पड़ता ? पर अधीरता ही किसी की उसे इतना कृपण बना दे तो ?
इधर 2 जून को भयंकर रेल हादसे में 288 लोगों के मारे जाने से पूरा देश स्तब्ध है। बालासोर ओडीशा में तीन -तीन ट्रेनों के टकराने से दिल दहला देने वाली दुर्घटना ने एक बार फिर केंद्र सरकार की प्राथमिकताएं उजागर कर दी हैं। कोविड के बाद से जिस तरह यात्री ट्रेन बहुत माँग के बाद भी जरूरत से बहुत कम कर दी गईं हैं, किराया दोगुना कर दिया गया है, ट्रेनों में ऐसी कोच की संख्या बढ़ाकर स्लीपर के कोच घटाते हुए तीन या चार औसत किये जाने की कवायद चल रही है, इससे पहले सीनियर सिटीजन को मिलने वाली टिकट की रियायत खत्म कर दी गई है। रेल मंत्री ने पिछले दिनों तकनीक के रेलवे में भी बेहतर इस्तेमाल सुनिश्चित करने पर जोर देते हुए हाई स्पीड ट्रेनों के आपस में भयंकर टकराव को रोकने के एंटी कोलिशन सिस्टम 'कवच' का लाईव परीक्षण किया पर फिर भी दर्घटना हो गई पूछा जाना चहिये - क्यों ? कैसे ? देशभर में बिछे लगभग 68000 किमी रेल लाइन में से कवच की सुरक्षा कितने को मिली है ? सिर्फ 2 से तीन हजार किमी में....ये क्या अनुपात हुआ भला? जाहिर है ऐसे प्रचार लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रख कर नहीं बल्कि पीएम मोदी का चेहरा चुनाव के पहले चमकाये रखने की नीयत से किये जा रहे हैं। यदि ये कारगर सुरक्षा उपाय थे तो फिर इतने लोगों की मौत कैसे हुई?
कौन जिम्मेदार है इसके लिए? भारत सरकार ने हाई स्पीड ट्रेन बनाने हाल ही में 'भेल' भारत हेवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड को आर्डर दिया है पर कोई ये भी तो बताए कि इन ट्रेनों को चलाने के लिए जिस तरह के रेल ट्रैक या पटरियां चाहिए वे देश में कितनी हैं भला ? 180 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली ट्रेन हो तो पेटरियां तो हमारे पास 110 किमी से चलने लायक भी नही हैं।
सचाई ये है कि अब सरकारें जनता के लिए नहीं बल्कि दुबारा हुकूमत का मौका हासिल करने की नीयत से काम करतीं हैं। देशभर में कोयले की खाने बड़े घरानों, उद्योगों को आवंटित हैं तो जाहिर है कोयले से बिजली बनेगी तो उसका परिवहन भी जरूरी है। अब चहेते घरानों को कोयले का परिवहन जरूरी है तो रेलगाड़ियां चाहिए। पटरियां सीमित हैं तो उन्हीं में मालगाड़ी से कोयला ढोया जा रहा है नतीजे में यात्री गाड़ियों की संख्या बहुत कम कर दी गई हैं। किराया दोगुना है तो आप कीजिये यात्रा अपनी बला से। न उनकी बिजली रुकेगी , न कोयला परिवहन रुकेगा आप अपना देख लीजिए। बस आप चुनाव तक जीवित रहिये वोट डालते तक बचे रहिये। ये कैसी सरकार है ?
- 07 Mar, 2026
समय हर बात की प्राथमिकतायें तय कर देता है और कभी - कभी बदल भी देता है। ऐसा ही इस बार यहां लिखने से पहले हुआ जब दिल्ली में न्याय की गुहार करती जंतर -मंतर पर देश की शान ओलंपिक पदक विजेता बेटियां अपने साथ हुए यौन शोषण के आरोपी सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते बैठी हैं,
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