• 07 Mar, 2026

खुल गई टनल, फंसे मजदूर बाहर निकाले गए

खुल गई टनल, फंसे मजदूर बाहर निकाले गए

• 12 नवंबर यानी दीपावली की सुबह से ही टनल में कैद रहे सारे श्रमिक • रात साढ़े सात बजे टनल से बाहर आया पहला मजदूर, 45 मिनट के भीतर सभी निकाल लिए गए

उत्तरकाशी। आधे माह से भी ज्यादा लम्बे संघर्ष के बाद आखिर जिंदगी जंग जीत ही गई। 12 बारह नवंबर के दिन यूं तो पूरा देश दीपावली पर्व की तैयारी में लगा था तभी सुबह साढ़े पांच बजे से उत्तराखंड की साढ़े चार किमी लम्बी सुरंग में 41 मजदूर  फंस गए थे।  खबर मिलते ही त्यौहार की खुशी उनके परिवारों परिजनों के घरों में तनाव में बदल गई थी। खबर मिलते ही युध्द स्तर पर बचाव कार्य शुरू कर दिये गए और सत्रह दिन चले बचाव कार्य के बाद उन सभी 41 मजदूरों को मंगलवार 28 नवंबर को सकुश  बाहर निकाल लिया गया। सभी सुरक्षित निकाल लिए गए मजदूरों को उपचार के लिए सिल्कयारा -डंडारगांव टनल से करीब 35 किमी दूर सिन्यालीसौड़ में बनाए गए अस्पताल में रखा गया है। बताया गया है कि वहां डाक्टर सभी लोगों का दो दिनों तक इलाज कर अपनी देखरेख में रखेंगें। बचाव कार्य में बहुत सी बाधायें आईं। एक के बाद एक विदेशी मशीनें नाकाम होती चलीं गईं अंततः रैट मारइर्स( चूहों  की तरह पहाड़ खोदने वाले विशेषज्ञों की टीम) को काम पर लगाया गया जो सफल रहा। इस देसी तकनीक से मजदूरों को बाहर निकाला जा सका। इस टीम के 12 विशेषज्ञ सदस्यों लगातार 12 घंटों तक हाथ से खुदाई की। आखिरी 15 मीटर का मलबा हाथ से हटाने के  बाद वहा 800 मीटर का पाइप लगाकर रास्ता आसान बनाया गया। टनल  से सबसे पहले चंद्रण  धोरणी निकले। बाहर बचाव कर्मियों ने उन्हें माला पहनाकर उनका स्वागत किया। 

  1. तीन पाइप तीन लाइफ लाइन ...
  2. ये न होते तो शायद मजदूर भी न बचते...
  • सुरंग में फंसते ही सुपरवाइजर गबर सिंह नेगी को 12 नवंबर को सुरंग में पानी भरता हुआ दिखा। फौरन उन्होंने पंप चला दिया जिससे पंप ने पानी खींचा और चार इंच पाइप के जरिये बाहर फेंकना शुरू किया।  पाइप का एक छोर मलबे के दूसरी ओर था इसलिए  बचाव दल को पंप की आवाज आ गई । उन्हें अहसास हो गया कि मजदूर जीवित हैं। फिर इसी पाइप के जरिये टनल में फंसे हुए मजदूरों से बात भी हुई। उन्हें चने बिस्किट भेजे गए। 
  • 20 नवंबर को मजदूरों ने खाना मांगा तब एक छह इंच का पाइप मलबे में डाला गया। वो आसानी से मजदूरों तक पहुंच भी गया। इसी के जरिये सालिड फूड और जूस आदि भेजे गए। तब जाकर 9 दिन बाद मजदूरों ने खाना खाया।
  • 21 नवंबर को 800 एमएम चौड़ा पाइप अंदर भेजा गया क्योंकि 900 एमएम पाइप अंदर आगे नहीं बढ़ पा  रहा था। यही पाइप अंत में लाइफ लाइन बना क्योंकि इसी के जरिए रैट माइनर्स ने आगे आसानी से टनल खोद सके। 

 

  • बड़ी मुश्किल ..
  • 16 घंटे कटर चलाया गया..

    ट्रेंचलेस इंजीनियरिंग सर्विसेज के तकनीशियन प्रवीण यादव  और बलविंदर ने पाइप में 45 मीटर अंदर लगातार 16 घंटे प्लाज्मा गैस कटर चलाया। इससे ऑगर मशीन के शॉफ्ट में फंसे सरिया को काटा गया। इसके पास दस ब्लोअर से आक्सीजन भेजी गई। फिर भी अंदर की गर्मी दम घोंट रही थी इसलिए हर 25 मिनट में बाहर आ जा रहे थे ताकि आक्सीजन की पूर्ति हो सके और शरीर का तापमान नियंत्रित रखा जा सके। 

 

  • रात-दिन अनथक संघर्ष ..
  • 400 जवान, 50 विशेषज्ञ

आईटीबीपी( इंडो तिब्बत बॉर्डर पुलिस)  के 150, एनडीआरएफ  के 50 , एसडीआरएफ के 100 जवान,20 भारतीय और तीन देशों के 10 विदेशी विशेषज्ञ बचाव कार्य में शामिल रहे । इसके अलावा एनएचआईडीसीएल के 50, नवयुग कंस्ट्रक्शन कंपनी के 50  और इनके साथ ड्रिलिंग करने वाले 50 अफसर व स्टाफ भी पूरे 17 दिन जुटे रहे।

  • मजदूरों तक पाइप पहुंचाने के बाद एनडीआरएफ के जवान एक-एक कर अंदर गए। मजदूरों की तरफ पाइप का छोर जमीन से 3 किमी ऊपर था। मिट्टी गीली थी, इसलिए जवानों ने जमीन से पाइप के मुहाने तक एक रैंप बनाया। रैंप 800 एमएम पाइप के एक ही टुकड़े से बनाया गया था। 
  • टनल से बाहर निकलते ही मजदूरों के चेहरे खिले हुए थे...