एसआई और एएसआई के 600 से ज्यादा पदों पर होगी भर्ती
● पुलिस भर्ती के लिए वैकेंसी इसी महीने ● इस बार व्यापमं से मंगाए जाएंगे आवेदन
• 12 नवंबर यानी दीपावली की सुबह से ही टनल में कैद रहे सारे श्रमिक • रात साढ़े सात बजे टनल से बाहर आया पहला मजदूर, 45 मिनट के भीतर सभी निकाल लिए गए
उत्तरकाशी। आधे माह से भी ज्यादा लम्बे संघर्ष के बाद आखिर जिंदगी जंग जीत ही गई। 12 बारह नवंबर के दिन यूं तो पूरा देश दीपावली पर्व की तैयारी में लगा था तभी सुबह साढ़े पांच बजे से उत्तराखंड की साढ़े चार किमी लम्बी सुरंग में 41 मजदूर फंस गए थे। खबर मिलते ही त्यौहार की खुशी उनके परिवारों परिजनों के घरों में तनाव में बदल गई थी। खबर मिलते ही युध्द स्तर पर बचाव कार्य शुरू कर दिये गए और सत्रह दिन चले बचाव कार्य के बाद उन सभी 41 मजदूरों को मंगलवार 28 नवंबर को सकुश बाहर निकाल लिया गया। सभी सुरक्षित निकाल लिए गए मजदूरों को उपचार के लिए सिल्कयारा -डंडारगांव टनल से करीब 35 किमी दूर सिन्यालीसौड़ में बनाए गए अस्पताल में रखा गया है। बताया गया है कि वहां डाक्टर सभी लोगों का दो दिनों तक इलाज कर अपनी देखरेख में रखेंगें। बचाव कार्य में बहुत सी बाधायें आईं। एक के बाद एक विदेशी मशीनें नाकाम होती चलीं गईं अंततः रैट मारइर्स( चूहों की तरह पहाड़ खोदने वाले विशेषज्ञों की टीम) को काम पर लगाया गया जो सफल रहा। इस देसी तकनीक से मजदूरों को बाहर निकाला जा सका। इस टीम के 12 विशेषज्ञ सदस्यों लगातार 12 घंटों तक हाथ से खुदाई की। आखिरी 15 मीटर का मलबा हाथ से हटाने के बाद वहा 800 मीटर का पाइप लगाकर रास्ता आसान बनाया गया। टनल से सबसे पहले चंद्रण धोरणी निकले। बाहर बचाव कर्मियों ने उन्हें माला पहनाकर उनका स्वागत किया।
आईटीबीपी( इंडो तिब्बत बॉर्डर पुलिस) के 150, एनडीआरएफ के 50 , एसडीआरएफ के 100 जवान,20 भारतीय और तीन देशों के 10 विदेशी विशेषज्ञ बचाव कार्य में शामिल रहे । इसके अलावा एनएचआईडीसीएल के 50, नवयुग कंस्ट्रक्शन कंपनी के 50 और इनके साथ ड्रिलिंग करने वाले 50 अफसर व स्टाफ भी पूरे 17 दिन जुटे रहे। |
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