महीनेभर विधानसभाओं के लिए चुनाव की सरगर्मियां रहीं। ।होने को तो पाँच प्रदेशों में हो रहे थे पर सब अटकलों में से मणिपुर में रुख साफ ही रहा। बचे छत्तीसगढ़, तेलंगाना, राजस्थान और मध्यप्रदेश तो इस दफा नमो का तिलस्म भी अब वैसा रहा नहीं। आने वाले लोकसभा चुनाव के लिए ऊपर से संयुक्त विपक्ष के रूप में 'इंडिया' के उदय ने सत्तापक्ष की चिंता बढ़ा दी है। छत्तीसगढ़ में दो चरणों मे हुए चुनाव लगभग शांतिपूर्ण निबट गए। पहले चरण में नक्सल प्रभावित दुर्गम समझे जाने वाले 20 विधानसभा क्षेत्रों में 7 नवम्बर को छिटपुट घटनाओं के साथ चुनाव हुए फिर बाकी के बचे 70 सीटों के लिए भी 17 नंवबर को चुनाव दूसरे चरण में पूरे कर लिए गए। देशभर में ठीक इसके पूर्व दीपावली त्यौहार भी उत्साह से मनाया गया ।
कोविड कोरोना महामारी के बाद पहली बार बहुत उत्साह से आतिशबाजी की गई और बाजार में रौनक भी उम्मीद के अनुकूल ही रही। दीपावली केसाथ ही लोकतंत्र का यह चुनावी महापर्व भी था पर उसके कुछ महीनों पहले से केंद्रीय एजेंसी एनफोर्समेंट डिरेक्टोटेट ईडी के ताबड़तोड़ छापों ने प्रदेश के सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं के हौसले पस्त करने की बेहिसाब कोशिशें की। शराब घोटालों से लेकर महादेव सट्टा एप के जरिये सैकड़ों करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप लगे, राजधानी रायपुर के होटल से रुपये पहुंचाए जाने सम्बन्धी टिप ऑफ़ मिलने पर ईडी ने छापे मारे। रुपए बरामद भी हुए। दुबई से सट्टे के तार जुड़े होने और सत्तापक्ष के लोगों के साथ यहां तक कि सीएम बघेल की संलिप्तता भी होने के आरोप लगाए गए। लगातार केंद्रीय एजेंसी ईडी की कार्रवाई को समूचे देश में सोशल मीडिया पर ट्रोल तक किया गया कि केंद्र की सरकार ने तो ईडी को मानो आपना हथियार ही बना लिया है। कतिपय पीड़ितों ने तो सुप्रीमकोर्ट के भी दरवाजे खटखटाये। कोर्ट ने भी ईडी को बिना पर्याप्त सबूत के ताबड़तोड़ कार्रवाई न किये जाने की हिदायत दी। बावजूद तमाम सावधानियों, और एहतियातों के चुनाव में भरपूर शराब, रुपयों , साड़ियों , कंबलों का इस्तेमाल हुआ जो आम चलन से अलग नही था।
छत्तीसगढ़ में किसानों को साधने के लिए जो भी वादे कांग्रेस ने पिछले चुनाव में अपने घोषणापत्र में किये और निभाये थे, भाजपा उसका तोड़ नही ढूंढ पाई। किसानों को उनकी फसल की वाजिब कीमत देने के अपने वादे से मुकर कर पूर्व सीएम डॉ रमन सिंह ने जो धोखा किया था उसकी भारी कीमत भाजपा को चुकानी पड़ी थी।। फिर तीन - तीन टर्म में सत्ता के नशे में मदांध हुए मंत्रियों कार्यकर्ताओं से जनता त्रस्त तो हो ही गई थी। इसी सब से लोगों का मन उचट गया था। बस इसी बीच किसानों की फसल की वाजिब कीमत,बोनस आदि के वादे के साथ कांग्रेस का सामने आना और चुनाव जीतते ही कुछ ही घन्टों में उन वादों को पूरा करने से कॉंग्रेस की साख बढ़ी थी। इनके साथ ही कर्ज माफ कर भी किसानों की राहत दी गई। तब कोरोना की मार से कराहते देश में उस समय भी किसानों की जेबें भरी हुई थीं। रहा सहा कसर भी कांग्रेस ने भजपा से उनका एक और पंसन्दीदा मुद्दा छीन कर पूरा कर दिया। राम वनगमन मार्ग को पर्यटन सर्किट बना कर और चंदखुरी में माता कौशल्या का भव्य मंदिर बनवा कर उन्हे लगभग मुद्दा विहीन कर डाला।
बावजूद पुरानी सफलता के पाँच साल सत्ता में रहते कुछ नाकामियों के जिम्मे से कोई भी सरकार बच नही सकती । चुनाव ही वह समय है जब वोटर सरकारों की मार्कशीट बनाते हैं। कोई सरकार अपनी कामयाबी के लिए चाहे जितना आश्वस्त रहे डर की लहरें उसे चुनाव के नतीजों तक मथती रहती हैं। जाहिर है केंद्र में काबिज विपक्ष पर प्रदेश की सरकार पर दबाव बनाने के चाहे जितने आरोप लगें कुछ सचाई तो उनमें भी होती ही है। ठीक यही सचाई डर बनकर सत्तापक्ष को डसती रहती है। और फिर ये मान लेना कि सत्ता से विमुख पार्टी बिल्कुल ही कमजोर है और उसके जीत सकने की हैसियत पर ही सवाल खड़े कर दिए जाएं, उचित नहीं है।
लोकतंत्र के अब तक के दर्जनों चुनाव नतीजे सारे पूर्वानुमानों और एग्जिट पोल को सिरे से गलत साबित करते रहे हैं। अनेक बार अप्रत्याशित चौकाने वाले नतीजे वोटरों तक को हतप्रभ करते रहे हैं। कई बार तो अनुशासित पार्टियों के नेताओं की आपसी कुस्तियाँ भी कम दिलचस्प नजारे पैदा नहीं करतीं। बाजवक्त ऐसा भी होता है कि पुराने धुरंधरों की नैया भी भंवर में होती है और उनकी आंखों के सामने भी हार की जिल्लत का डर तमाशा करने लगता है। हालात ही कुछ ऐसे बन जाते है या कि बना दिये जाते हैं।
प्रदेश के चुनाव में इसकी भी भरपूर झलकियां देखने मिलती रहीं। अब 3 दिसम्बर का बेसब्री से इंतजार है जब पाँच राज्यों के नतीजे घोषित किये जायेंगे।