• 07 Mar, 2026

उत्तराखंड टनल में कैसे गुजरे 17 दिन....

उत्तराखंड टनल में कैसे गुजरे 17 दिन....

पहले दो दिन बहुत डर में बीते, 8 दिनो तक रिसता पानी चांट कर और चने खाकर गुजारे चोर-पुलिस खेलते, टहलकर थकते ही सो जाते .....

उत्तरकाशी। उत्तराखंड की सिल्क्यारा-डंडारगांव टनल में 17 दिन अंधेरे में गुजारने वाले सभी 24 मजदूर पूरी तरह स्वस्थ बताये गए हैं। बुधवार 28 नवंबर की सुबह इन सभी को चिन्यालीसौड़ के अस्पताल से एम्स ऋषिकेश शिफ्ट कर दिया गया है। जहां बताया गया कि इन सभी की मेडिकल जांच की जानी है। निरंतर पहल संवाददाता ने इनमें से कुछ मजदूरों से बात कर जाना कि आखिर इन दिनों में किन हालातों से दो-चार होना पड़ा था...

  • हम जिंदा रहने की उम्मीद छोड़ते जा रहे थे-
    हम सभी के लिए इस हादसे के बाद शुरुआती दो दिन बहुत डरावने थे। मलबा बढ़ता जा रहा था। पहले दिन तो भूखे ही रहे। दीवारों से रिसता पानी चांट कर जिंदा रहे। टलन में फोन से दिन रात का पता चलता था। तीसरे दिन हमें चने खाने को मिले। मैने कागज से कुछ कार्ड बनाये। इससे खेलना शुरू किया। शाम होती तो बच्चों की तरह चोर -सिपाही खेलते थे। टनल का हमारी तरफका हिस्सा दो किमी तक खुला तो हम घंटो पैदल घूमते थे। थक जाते तो सो जाते। दसवें दिन खाना मिला। जान में जान आई।

अनिल बेदिया, खिरबेरा , रांची।

 

  • टनल ने सिखाया, घबराओ नहीं , हमेशा उम्मीद रखो...
    हम काम कर रहे थे, तभी मलबा गिरा। भगदड़ मच गया। मैने सबको शांत किया। जब सन्नाटा हुआ तो सभी ने कान मलबे से लगाए। शायद आवाज आ जाए पर आवाज नहीं आई तो हम समझ गए कि मदद में देर  होगी। हमने तय किया दिन खेलते-कूदते,योग अच्छी नींद सहित खूब पानी पीकर और एक दूसरे को हिम्मत बढ़ाकर बिताएंगे । टनल ने हमें सिखाया कि घबराओ मत, सबको साथ रखो। बात सुनो और उम्मीद मत छोड़ो।

गबर सिंह नेगी, कोटद्वार, उत्तराखंड