नीरू सैनी, अद्भुत ऊर्जा और अदम्य साहस से लबालब महिला
● 50 पार की उम्र में वो सब कुछ किया जिसके लिए कभी उनका दिल मचलता था और जिन कामों में सिर्फ युवाओं के हस्तक्षेप की कल्पना होती है...
मैनपाट कुदरत से मिले को लौटाने की ज़िद एक रिटायर जुनूनी फौजी ने धूल उड़ाती ज़मीन को हरियर चादर में बदल दिया
सेवा निवृत्ति को बाद मिली जमीन पर 2017 से एक परियोजना पर काम शुरू कर बनाया लीची फार्म
गांव कुनिया की तकदीर ही बदल कर रख दी, कुल 5 साल में 8 एकड़ जमीन को जन्नत में बदल दिया
सुनियोजित ढंग से 27 तरह के फलों के पेड़ लगाकर कर रहे पर्याप्त कमाई और अपने मन के काम का सुकून है
एक्स आर्मी लीची फार्म कुनिया में 30 लोगों के मिलता है रोजगार
लोगों के लिए बनाना चाहते थे शहर के उद्यान सरीखा बागीचा और पांच साल की मेहनत के बाद बन गया लीची फार्म
समीर दीवान, रायपुर मैनपाट (अंबिकापुर) । निकले तो हम मैनपाट के लिए थे पर उसके रास्ते में बहुत सी चीजों ने आकर्षित किया उनमें से एक था अंबिकापुर से दरिमा गांव से होते हुए मैनपाट के रास्ते में ग्राम कुनिया में सड़क से लगा दूर तक फैला हुआ ‘एक्स आर्मी लीची फार्म’ और नर्सरी। जून के महीने में दिन का तापमान तो मैनपाट में भी 32 डिग्री तक होता है पर सुबह और रात का तापामान 24 के आसपास सुखद बना रहा। ऐसे समय में दूर तक फैली हरियाली आंखों और मन को सुकून देने वाली थी, हमने वहीं रुक कर इस हरियाली का राज जानने की कोशिश की। वहां नर्सरी के एक कर्मचारी से भीतर फार्म में जाने की अनुमति लेनी चाही तो थोड़ी देर बाद वह एक छरहरे आदमी के साथ बाहर आया। ये सज्जन दिखने में तिब्बती मालूम हो रहे थे। उन्होंने हमारा मुस्कान से स्वागत किया और जान लेने के बाद कि मेरी पत्नी बॉटनी की प्रोफेसर हैं और इस लीची फार्म और सुंदर समृध्द नर्सरी ने हमें यहां रोक लिया और हम आपका लिची फार्म और नर्सरी देखना चाहते हैं – वे तो सहर्ष राजी हो गए। फिर तो उन्होंने बहुत रुचि लेकर अपने उद्यम की जानकारियां दीं और 7 जून की दोपहर से शाम तक हम उनके फार्म में उनके साथ रहे। हमने नर्सरी के बाहर अपनी कार पार्क की और जब एक साधारण से गेट से भीतर पहुंचे जिस पर लिखा था कुत्तों से सावधान तो हम डरे हुए थे। उन्होंने हमें आश्वस्त किया कि वे भीतर बंधे हुए हैं आप लोग चिंता न करें तब ही जाकर हम सामान्य हो पाए।
शादी कहां हुई आपकी बच्चे क्या करते हैं लाक्पा जी आपके ?
निहायत निजी जीवन के सवाल पर कहते हैं मेरी शादी देहरादून में ही हुई जब वहां के एनआईटी में कर्नाटका की एक लड़की कम्पयूटर का कोर्स करने आती थी और आफिस का टाइम खत्म होने पर मै भी वहीं कुछ सीखने जाता था तो वहीं मुलाकात हुई थी पेम्पा नाम है मेरी पत्नी का । मेरे दो बेटे हैं- पासंग और छतल एक की पढ़ाई पूरी हो गई वो अमेरिका जाना चाहता है जॉब करने। दूसरे की पढ़ाई चल रही है। मां है मेरी साथ यहां उनका नाम सोनम है। मेरी दो सिस्टर भी हैं जिनमें से बड़ी भी हमारे साथ यहीं फार्म में रहती है। छोटी सिस्टर कैम्प नंबर वन में अस्पताल में नर्स हैं। ( मैनपाट में सात तिब्बत्ती बस्तियां हैं जिन्हें कैंप एक से कैंप सात तक के नाम से जानते हैं। ) हमारा बेंगलूरु के पास मैसूर रोड में कपड़ों का शॉप है जिसका नाम है ‘पेम्पास कलेक्शन’ मेरी पत्नी के नाम पर है शॉप का नाम । वही थोड़ी सी जमीन भी है बस मैं यहां मैनपाट में वर्कर्स के साथ रहता हूँ। बीच –बीच में मैं बेंगलुरू जाता हूं जब सामान खरीदना होता है तो सिंगापुर, बैंकाक जाकर कंसाइनमेंट बेंगलुरू भेज कर फिर मैनपाट लौट आता हूँ मुझे तो यही फार्मिंग का काम ही अच्छा लगता है कहते हुए... लाक्पा मुस्कुराते हैं।
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| प्रबंधक सौरभ वर्मा और नरेश यादव सहृदय रिसार्ट कर्मी हंसमुख मित्र ... हम जिस रिसार्ट में ठहरे हुए थे वहां के युवा प्रबंधक सौरभ वर्मा और नरेश यादव सहृदय कर्मचारी हैं। हमने अपने वहां रुकने के दौरान देखा कि सौरभ रिसार्ट के मेहमानों का बड़े अपनापे से ख्याल रखते हैं शायद उनके पेशे के अनुरूप उनमे सेवा-भावना पहले से ही मौजूद रही हो। प्रारंभिक बातचीत में थोड़ा परिचय भी निकल आया तो उन्होंने अपने एक हंसमुख सहयोगी नरेश यादव को हमें यह कहकर लगभग सौप ही दिया कि ये आपको मैनपाट की सैर करा देंगे। फिर तो हम बेफिक्र हो गए और पूरे समय नरेश हमारे साथ ही रहे। स्थानीय गांव कमलेश्वरपुर के रहने वाले नरेश यादव की नियुक्ति भी वैसे तो किसी एक काम के लिए ही हुई है पर रिसार्ट के प्रबंधक का यह चहेता कर्मचारी है। हरफनमौला, हर बात के लिए हमेशा हाजिर और हंसता हुआ। ऐसा व्यक्ति किसे नहीं भाएगा भला। जब उसे पता चला कि मैं अपनी पत्नी के साथ मैनपाट में हूँ और मेरे साथ आने वाला ड्राइवर अपने घर में किसी हादसे की वजह से वह साथ नहीं आ पाया तो उसने हमारी कार ड्राइव करने के साथ मैनपाट और आसपास की तमाम देखने लायक जगह गाइड बनकर दिखाने की पेशकश कर दी। उसका अंदाज इतना लुभावन था कि हमने भी फौरन हामी भर दी। बातचीत से उसे लगा कि हमारी रुचि मैनपाट के लीची फार्म और तिब्ब्तियों के मोनेस्ट्री के बारे में जानने की है उसने हमें दूसरे ही दिन सुबह से तिब्बतियों के डोलमा रिसॉर्ट, 1962 में तिब्बत से यहां आने के बाद उनके बसाए गए सातों कैम्पों, तिब्बत्ती रेस्त्रां कर्मा रिसॉर्ट, उनके सबसे पुराने और नए मोनेस्ट्रीज, कुनिया में सूबेदार मेजर लाक्पा का एक्स आर्मी लीची फार्म और नर्सरी, नयाकेसरा गांव में दिलबर यादव का सब्जी फार्म, फिश पाइंट, सनराइज पाइंट, उल्टा पानी आदि सभी जगहों की सैर कराई। नरेश हमारे साथ इतने रूपों में मौजूद था कि वह मैनपाट की हमारी यात्रा और उससे जुड़ी स्मृतियों का एक हंसता मुस्कुराता हिस्सा हो गया है। वही हमारा गाइड रहा, वही हमारा रसोइया, वही ड्राइवर और मित्र .. लौटते हुए लगा कि हर किसी की यात्रा में एक सौरभ वर्मा और एक नरेश यादव जरूर होना चाहिए .. हमारा मैनपाट प्रवास इन दोनों की वजह से बहुत सुखद और सुविधापूर्ण रहा..। | |
● 50 पार की उम्र में वो सब कुछ किया जिसके लिए कभी उनका दिल मचलता था और जिन कामों में सिर्फ युवाओं के हस्तक्षेप की कल्पना होती है...
सिद्धू मूसेवाला की मां को चंडीगढ़ के एक प्राइवेट अस्पताल में एडमिट करवाया गया है।
International Women's Day के अवसर पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय दंतेवाड़ा जिले के जावंगा पहुंचे।
■ हमारे साझा सरोकार "निरंतर पहल" एक गम्भीर विमर्श की राष्ट्रीय मासिक पत्रिका है जो युवा चेतना और लोकजागरण के लिए प्रतिबद्ध है। शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती और रोजगार इसके चार प्रमुख विषय हैं। इसके अलावा राजनीति, आर्थिकी, कला साहित्य और खेल - मनोरंजन इस पत्रिका अतिरिक्त आकर्षण हैं। पर्यावरण जैसा नाजुक और वैश्विक सरोकार इसकी प्रमुख प्रथमिकताओं में शामिल है। सुदीर्ध अनुभव वाले संपादकीय सहयोगियों के संपादन में पत्रिका बेहतर प्रतिसाद के साथ उत्तरोत्तर प्रगति के सोपान तय कर रही है। छह महीने की इस शिशु पत्रिका का अत्यंत सुरुचिपूर्ण वेब पोर्टल: "निरंतर पहल डॉट इन "सुधी पाठको को सौपते हुए अत्यंत खुशी हो रही है। संपादक समीर दीवान
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