• 07 Mar, 2026

बेमौसम की सब्जी बेच कर लाख रुपये महीना कमाते हैं मैनपाट के दिलबर यादव

बेमौसम की सब्जी बेच कर लाख रुपये महीना कमाते हैं मैनपाट के दिलबर यादव

मैनपाट कुदरत से मिले को लौटाने की ज़िद एक रिटायर जुनूनी फौजी ने धूल उड़ाती ज़मीन को हरियर चादर में बदल दिया

 सेवा निवृत्ति को बाद मिली जमीन पर  2017 से एक परियोजना पर काम शुरू कर बनाया लीची फार्म
 गांव कुनिया की तकदीर ही बदल कर रख दी, कुल 5 साल में 8 एकड़ जमीन को जन्नत में बदल दिया
 सुनियोजित ढंग से 27 तरह के फलों के पेड़ लगाकर कर रहे पर्याप्त कमाई और अपने मन के काम का सुकून है
 एक्स आर्मी लीची फार्म कुनिया  में 30 लोगों के मिलता है रोजगार
 लोगों के लिए बनाना चाहते थे शहर के उद्यान सरीखा बागीचा और पांच साल की मेहनत के बाद बन गया लीची फार्म

समीर दीवान, रायपुर मैनपाट (अंबिकापुर) ।  निकले तो हम मैनपाट के लिए थे पर उसके रास्ते में बहुत सी चीजों ने आकर्षित किया उनमें से एक था अंबिकापुर से दरिमा गांव से होते हुए मैनपाट के रास्ते में ग्राम कुनिया में सड़क से लगा दूर तक फैला हुआ ‘एक्स आर्मी लीची फार्म’ और नर्सरी। जून के महीने में दिन का तापमान तो मैनपाट में भी 32 डिग्री तक होता है पर  सुबह और रात का तापामान 24 के आसपास सुखद बना रहा। ऐसे समय में दूर तक फैली हरियाली आंखों और मन को सुकून देने वाली थी, हमने वहीं रुक कर इस हरियाली का राज जानने की कोशिश की। वहां नर्सरी के एक कर्मचारी से भीतर फार्म में जाने की अनुमति लेनी चाही तो थोड़ी देर बाद वह एक छरहरे आदमी के साथ बाहर आया। ये सज्जन दिखने में तिब्बती मालूम हो रहे थे। उन्होंने हमारा मुस्कान से स्वागत किया और जान लेने के बाद कि मेरी पत्नी बॉटनी की प्रोफेसर हैं और इस लीची फार्म और सुंदर समृध्द नर्सरी ने हमें यहां रोक लिया और हम आपका लिची फार्म और नर्सरी देखना चाहते हैं – वे तो सहर्ष राजी हो गए। फिर तो उन्होंने बहुत रुचि लेकर अपने उद्यम की जानकारियां दीं और 7 जून की दोपहर से शाम तक हम उनके फार्म में उनके साथ रहे। हमने नर्सरी के बाहर अपनी कार पार्क की और जब एक साधारण से गेट से भीतर पहुंचे जिस पर लिखा था कुत्तों से सावधान तो हम डरे हुए थे। उन्होंने हमें आश्वस्त  किया कि वे भीतर बंधे हुए हैं आप लोग चिंता न करें तब ही जाकर हम सामान्य हो पाए। 

  • एक साधारण से गेट के भीतर लगभग सब कुछ ही असाधारण है
     यकीन मानिये बाहर से साधारण से दिखते उस गेट के भीतर सब कुछ ही लगभग असाधारण था। भरी गर्मी में एक बड़ा सा फार्म हराभरा था और लगभग सारे पेड़ फलों से लदे हुए थे। 
    जिनका ये फार्म है उनका नाम लाक्पा है... सेना से सूबेदार मेजर के पद से रिटायर हुए हैं और रिटायरमेंट के बाद सरकार से जो जमीन मिली है उसी में कुछ और ज़मीन मिला कर कुल साढ़े आठ एकड़ के विस्तृत फार्म में इतना पसीना बहाया कि अब यहां उनकी मेहनत लहलहा रही थी। बातचीत से लगा कि ये फौजी बहुत जुनूनी हैं और उस जगह को हरियाली से झूमता देखना उनका सपना है जहां वे जन्में थे। क्या नहीं था उनके इस फार्म में जिसे उन्होंने 2017 के बाद से अपने सपने के अनुरूप बनाना-संवारना शुरू किया था और 2019 के आते-आते यह इस शक्ल में  विकसित हो पाया था कि अब यहां कुल  27 तरह के फलों के पेड़ न सिर्फ फूलते-फलते हैं बल्कि अच्छी खासी कमाई देते हैं और हर मौसम में औसतन 6 से 30 तक मजदूरों को नियमित रोजगार भी।  लाक्पा के फार्म में यू तो बहुत तरह के पेड़ हैं पर इनमें मुख्य रूप से लीची की मात्रा अधिक है। यहां का मौसम लीची के मिजाज के अनुकूल है तो यहां वे भरपूर फलते भी हैं जिनसे अच्छी कीमत भी मिलती है।
     पूरा फार्म अत्याधुनिक सिंचाई- सुविधा से सज्जित है और हर पौधे को पानी की खुराक मिले  इतना सटीक इंतजाम लाकपा की दूरदृष्टि को दर्शाता हुआ एक नमूना है। जब हम पौधों और उनकी देखरेख के तरीकों और ऐहतियात की जानकारी लेते हुए थक गए तो उन्होंने हमें फार्म के बीचो-बीच बने कच्चे छावन में आने का न्योता दिया यह कहते हुए कि –आइये यहां बैठकर बात करते हैं।
    • उनसे यह पूछने पर कि इतने सुंदर जगह को गढ़ने की शुरूआत कैसे हुई तो उन्होंने बड़ी रुचि से किस्सा बयान किया .. जहां हम बैठे थे वहां से एक कोने की ओर इशारा करके उन्होंने कहाकि यहीं साठ के दशक में 1963 में मेरा जन्म हुआ था तब यह जगह पूरी तरह से घने जंगलों से घिरा था । यहां जंगली पशु तो हमारे घरों के आस-पास मंडराते होते थे। मेरे माता-पिता ठीक मेरे जन्म से एक साल पहले 1962 में तिब्बत से शरणार्थी के रूप में यहां आए थे और मेरा जन्म यहां ही हुआ  तो तकनीकी रूप से भले ही मेरे माता-पिता तिब्बत से थे पर मेरा जन्म यहां होने से मैं पूरी तरह भारतीय ही हूँ। मेरी पढ़ाई लिखाई चल रही थी और 9 कक्षा के बाद मुझे मेरे माता-पिता ने मसूरी भेज दिया जहां से आगे की पढ़ाई की और मिलिटरी स्कूल देहरादून के बाद फौज में चला गया... 2019 में रिटायरमेंट के बाद यहां अपने घर लौटा.. पहले भी छुट्टियों में आता रहा  हूँ तो लगता था कि मेरे बचपन में जो यहां इतना सुंदर घना जंगल था वो अब सब समाप्त हो गया है इसे फिर से कैसे बना सकते हैं... बस यही एक जुनून था मन में ।  तो जब मैं देहरादून में था तो हमारे पड़ोस  में एक सज्जन का बागीचा था बहुत सुंदर उनको काम करते देख मन करता था ऐसा ही कुछ मुझे भी करना है। फिर लद्दाख में मेरी पोस्टिंग के दौरान वहां आफिसर्स क्लब में एक रिवाज ही था जिसे कपिंग कहते थे। इसमें अफसर अपने पसंद के टॉपिक पर डिस्कशन करते थे। वहां मैंने कहा मुझे अपने घर लौट कर एक जंगल बनाना है जो मेरे बचपन में वहां हुआ करता था। कैसे भी हो पर उसे वापस वैसा ही करना है..। मेरे साथ चंडीगढ़ से बहुत से सिख अफसर थे। एक हरभजन सिंह थे उन्होने कहा कि यार  जंगल ही बनाना है तो  उसकी जगह तो फलदार पेड़ लीची, पाइनएपल जैसा कुछ लगाना चाहिए। फल भी मिलेंगे और हरियाली भी होगी ।  बस मुझे लगा ये तो बहुत अच्छा आइडिआ है।  
      चाहता तो था कि एक बड़ा सा बागीचा जैसा बना दूं जिसमें लोग घूमने आएं और इसके चारो ओर पेवमेंट लगा दूं जिससे लोग इसमें चल सकें जैसा कि शहरों में मुनिसिपल के गार्डन में होता है। इस तरह बागीचा बनाने से फलदार पेड़ तो नहीं बचेंगे लोगों ने कहा.. मैंने कहा ये तो उनका सोचने का काम है उनको सोचना चाहिए कि यदि किसी ने उनको सुंदर गार्डन फलों वाला दिया है तो उसके साथ कैसा सलूक करना है। मैंने सोचो मेरा काम मैं कर देता हूँ लोग अपना काम करें ...ऐसा ही मेरा सोचना था।
         और जब यहां रिटायर होकर लौटा तो ये अब हमेशा के लिए ही लौटना था तो फिर अपने मन का काम शुरू कर दिया। यहां जिस जगह हम अभी बैठे हैं यहां एकदम ‘सुख्खा था सुख्खा’ ( सूखा ), कुछ भी नहीं था। लोग यहां बारिश का इंतजार करते थे और एक फसल लेकर तीन महीने इंतजार के बाद फसल काट कर पूरे साल आराम फरमाते थे। पहले हमारे दादा लोग मिंझरी या खेढ़ी लगाते थे। तीन ही महीने काम होता था फिर आराम।  मुझे इसे बदलना था तो शुरू कर दिया। इस पूरे 8 एकड़ के हिस्से को तीन हिस्सों में बांट कर तीन बोर कराए फिर सभी को फ्लेक्सिबल पाइप से जोड़ कर बारहों महीने ड्रिप इरिगेश से हर पौधे को जरूरी मात्रा में पानी देने का इंतजाम किया, और मौसम के अनुरूप हर एक खंड में पौधे और पेड़ लगाए। ये 2017 से शुरू किया और धीरे-धीरे ये जगह ऐसी दिखने लगी कि यहां बैठने का यहां घूमने का मन करता है।
    • लोकल लोगों को बताना चाहते हैं कि एक ऐसी भी खेती होती है...
             लाक्पा कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि हम ये जता रहे हैं कि हम ये कर रहे हैं न ही इसे पैसे के लिए शुरू किया है। सरकार रिटायरमेंट के बाद बहुत सा पैसा देती है जो हमारे खर्च के लिए काफी है। पर हम यहां के लोकल लोगों को बताना चाहते थे कि देखो ऐसी भी एक खेती होती है.. केवल तीन महीने काम करके बैठ जाना ही जीवन नहीं है बल्कि आप यहां बारहों महीने काम कर सकते हैं। लोगों को काम मिलेगा। फिर केवल पैडी (धान) की पारंपरिक खेती  करने की जरूरत नहीं है इसके बाद भी बाकी के महीनों में अलग-अलग तरह के फसल ले सकते हैं। यहां तो हम लीची  अब टाऊ , आलू, चीकू,  कटहल, आड़ु, आम, अनार, नाशपाती सब लगाते हैं। कृषि विकास केन्द्र के वैज्ञानिकों से जानकारी लेकर  मधुरस भी पैदा करते हैं... कई तरह की मधुमख्खियां पाल रखी हैं यहां हमने।  यहां इरीगेशन को तीन हिस्सों में बांटा हुआ है। हर तीन महीने में वाल्व से पानी का प्रवाह बदल कर दूसरे हिस्से में करके दूसरी तरह का फसल लेते हैं। ये रोटेशन चलता रहता है इससे जमीन की फर्टीलिटी भी बढ़ती है। अब देखिये ये सामने लीची की फसल लेने के बाद हम इसके पेड़ की सफाई-छटाई में लग जाते हैं। इसकी बेकार की टहनियां काट दी जाती हैं तो हम इसमें गोटी बांध कर नया पौधा तैयार करते हैं जिसे नर्सरी में बेचने से उसकी भी कीमत मिलती है। 
  • गर्मियों में सब्जियां मैनपाट के नीचे के गांव बंदना से आती थी अब तो हम वहां जाकर बेचते हैं ....
      देखिए यहां मैने 2019 में पहली बार मक्का, भुट्टा लगाया तो अच्छी फसल हुई। तो यहां सब्जियां भी लगाने लगे। इससे पहले मैनपाट के नीचे एक गांव है बंदना जहां से लोग मैनपाट में गर्मियों में सब्जियां लाकर बेचते थे। यहां कुछ नहीं होता था। जो वो लोग लाते थे वही हमको खाना पड़ता था। जो वो कीमत लगाते वो हमको देना पड़ता था।  अभी एक दिलबर यादव जी हैं यहां मैनपाट में जो सब्जियां लगाते हैं अब हमारे लोग नीचे जाकर बंदना में सब्जियां बेचते हैं तो वे लोग कहते हैं अरे पहले हम लोग मैनपाट में जाकर बेचते थे और अब वो लोग यहां आकर बेच रहे हैं। तो यहां कि इकॉनॉमी में भी सुधार आया है। इतना ही नहीं इससे यहां पर लेबर को भी काम मिलता है । देखिये मेरे फार्म में सुबह साढ़े चार बजे से एक हेल्पर के साथ तो मैं ही काम करता हूं पर प्रतिदिन  6 लेबर यहां काम करते हैं तो 6 लोगों को एवरेज काम रहता ही है काम बढ़ा तो 20 से 30 लेबर भी काम करते हैं। हम यहां जमीन के ऊपर के फसल तो लेते ही है जमीन के भीतर आलू औऱ हल्दी भी लगाते हैं। शुध्द हल्दी का पाउडर यहां फार्म से ही लोग ले जाते हैं।
       जैसा आप देख रहे हैं ये पूरा फार्म बारहों महीने इरिगेशन का ठीक इंतजाम होने से हराभरा बना रहता है। फलों को बेचते कैसे हैं पूछने पर लाक्पा कहते हैं इसकी कोई समस्या नहीं है.. टूरिस्ट आते हैं वे फल तो फार्म से ही खरीद ले जाते हैं। रायपुर बिलासपुर के लोग तो कहते हैं हमारे यहां आने वाली बस में दे दीजिए हम वहां उतरवा लेंगे। दिल्ली मुंबई वाले तो ट्रेन से बुलवा लेते हैं।
  • तो कभी आपके फौजी साथियों ने आकर आपका काम देखा कि नहीं ?
     सूबेदार मेजर लाक्पा आपके काम के बारे में जब फौज के उनके साथियों ने सुना तो कोई देखने आया कि नहीं कि आप कैसा काम कर रहे हैं ?  इस सवाव पर लाक्पा लहक कर बताते हैं बिल्कुल...आये थे .. कुछ समय पहले ही एक ब्रिगेडियर रैंक के मोना पंजाबी अफसर को जब पता चला तो वे अपनी पत्नी के साथ आए थे उनके साथ औऱ भी कुछ बड़े-छोटे अफसर यहां पहुंचे और फार्म देखकर बहुत खुश हुए। ब्रिगेडियर तो सेना में बड़े अफसर होते हैं उनके साथ बहुत से लोग साथ चलते हैं । उनके सम्मान में यहां के एक होटल में एक पार्टी दी मैं ने और यहीं फार्म हाउस में टी पार्टी अरेंज किया था। काम को उन्होंने बहुत सराहा।  बहुत अच्छा लगा। 
     

शादी कहां हुई आपकी बच्चे क्या करते हैं लाक्पा जी आपके ? 
    निहायत निजी जीवन के सवाल पर कहते हैं मेरी शादी देहरादून में ही हुई जब वहां के एनआईटी में कर्नाटका की एक लड़की कम्पयूटर का कोर्स करने आती थी  और आफिस का टाइम खत्म होने पर मै भी वहीं कुछ सीखने जाता था तो वहीं मुलाकात हुई थी पेम्पा नाम है मेरी पत्नी का । मेरे दो बेटे हैं- पासंग और छतल एक की पढ़ाई पूरी हो गई वो अमेरिका जाना चाहता है जॉब करने।  दूसरे की पढ़ाई चल रही है। मां है मेरी साथ यहां उनका नाम सोनम है। मेरी दो सिस्टर भी हैं जिनमें से बड़ी भी हमारे साथ यहीं फार्म में रहती है। छोटी सिस्टर कैम्प नंबर वन में अस्पताल में नर्स हैं। ( मैनपाट में सात तिब्बत्ती बस्तियां हैं जिन्हें कैंप एक से कैंप सात तक के नाम से जानते हैं। ) हमारा बेंगलूरु के पास मैसूर रोड में कपड़ों का शॉप है जिसका नाम है ‘पेम्पास कलेक्शन’ मेरी पत्नी के नाम पर है शॉप का नाम । वही थोड़ी सी जमीन भी है बस मैं यहां मैनपाट में वर्कर्स के साथ रहता हूँ। बीच  –बीच में मैं बेंगलुरू जाता हूं जब सामान खरीदना होता है तो सिंगापुर, बैंकाक जाकर कंसाइनमेंट बेंगलुरू भेज कर फिर  मैनपाट लौट आता हूँ मुझे तो यही फार्मिंग का काम ही  अच्छा लगता है कहते हुए... लाक्पा मुस्कुराते हैं। 

प्रबंधक सौरभ वर्मा



 

नरेश यादव
प्रबंधक सौरभ वर्मा और नरेश यादव सहृदय रिसार्ट कर्मी हंसमुख मित्र ...
 हम जिस रिसार्ट में ठहरे हुए थे वहां के युवा प्रबंधक सौरभ वर्मा और नरेश यादव सहृदय कर्मचारी हैं। हमने अपने वहां रुकने के दौरान देखा कि सौरभ रिसार्ट के मेहमानों का बड़े अपनापे से ख्याल रखते हैं शायद उनके पेशे के अनुरूप उनमे सेवा-भावना पहले से ही मौजूद रही हो।  प्रारंभिक बातचीत में थोड़ा परिचय भी निकल आया तो उन्होंने अपने एक हंसमुख सहयोगी नरेश यादव को हमें यह कहकर लगभग सौप ही दिया कि ये आपको मैनपाट की सैर करा देंगे। फिर तो हम बेफिक्र हो गए और पूरे समय नरेश  हमारे साथ ही रहे। स्थानीय गांव कमलेश्वरपुर के रहने वाले नरेश यादव की नियुक्ति भी वैसे तो किसी एक काम के लिए ही हुई है पर रिसार्ट के प्रबंधक का यह चहेता कर्मचारी है। हरफनमौला, हर बात के लिए हमेशा हाजिर और हंसता हुआ। ऐसा व्यक्ति किसे नहीं भाएगा भला।  जब उसे पता चला कि मैं अपनी पत्नी के साथ मैनपाट में हूँ और मेरे साथ आने वाला ड्राइवर अपने घर में किसी हादसे की वजह से वह साथ नहीं आ पाया तो उसने हमारी कार ड्राइव करने के साथ मैनपाट और आसपास की तमाम देखने लायक जगह गाइड बनकर दिखाने की पेशकश कर दी। उसका अंदाज इतना लुभावन था कि हमने भी फौरन हामी भर दी। बातचीत से उसे लगा कि हमारी रुचि मैनपाट के लीची फार्म और तिब्ब्तियों के मोनेस्ट्री के बारे में जानने की है उसने हमें दूसरे ही दिन सुबह से तिब्बतियों के डोलमा रिसॉर्ट, 1962 में तिब्बत से यहां आने के बाद उनके बसाए गए सातों कैम्पों, तिब्बत्ती रेस्त्रां कर्मा रिसॉर्ट, उनके सबसे पुराने और नए मोनेस्ट्रीज, कुनिया में सूबेदार मेजर लाक्पा का एक्स आर्मी लीची फार्म और नर्सरी,  नयाकेसरा गांव में दिलबर यादव का सब्जी फार्म, फिश पाइंट, सनराइज पाइंट, उल्टा पानी आदि सभी जगहों की सैर कराई।  नरेश हमारे साथ इतने रूपों में मौजूद था कि वह मैनपाट की हमारी यात्रा और उससे जुड़ी स्मृतियों का एक हंसता मुस्कुराता हिस्सा हो गया है। वही हमारा गाइड रहा, वही हमारा रसोइया, वही ड्राइवर और मित्र .. लौटते हुए लगा कि हर किसी की यात्रा में एक सौरभ वर्मा और एक नरेश यादव जरूर होना चाहिए .. हमारा मैनपाट प्रवास इन दोनों की वजह से बहुत सुखद और सुविधापूर्ण रहा..।